जीवन जिने की कला

जोड़े वह धर्म- तोड़े वह अधर्म

सबसे पहले धर्म की व्याख्या आपको बतादू

आत्मा का आत्मा द्वारा आत्मा के लिए किया हुआ आत्मकल्याण ही धर्म है।

जीवन के व्यवहार में परिवार में सभी को जोड़ने वाला कोई तत्व है तो वह प्यार है।

परिवार का प्यार धरती का स्वर्ग है।
-आचार्य राजयशसुरिश्वरजी म.सा.

परिवार में सब के मन को देखते रहे, सब के मन को सवारते रहे वो प्यार है। वह धर्म है। भले ही सम्पत्ती न हो पर सब के बिच परस्पर प्रेम है, आनंद है, वह स्वर्ग है।
हमारी संस्कृती जहा सहनशीलता पर हमारी आस्था थी। मंदिर और मूर्ती टूटने से ही धर्म का नाश होता है यह बात पर्याप्त नहीं, आस्था टूटती है वहा धर्म का नाश होता है और अधर्म का आगमन होता है।
तलाक आज घर घर की कहानी बन गई है। हमारे समाज में तलाक याने सम्बन्ध का तोडना अधर्म है।

कबीर जी कहते है
“पोथी पढ़ पढ़ जग मुओ, पंडित भयो न कोय
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय”
इस पंक्ती में जीवन आदर्श की कुंजी है।

धर्म का सही अर्थ आत्मकल्याण है।
आत्मा का स्वभाव ज्ञान,दर्शन और चारित्र में है। वही धर्म है।
ज्ञान याने पदार्थ को जानना।
दर्शन याने पदार्थ के स्वरुप में आस्था रखना।
चारित्र याने अच्छे बुरे में गए बिना स्वरुप में आस्था रखना।

धर्म वही है जहा क्रोध नहीं माया नहीं लोभ नहीं यह सर्वत्र तोड़ने का काम ही धर्म है। वही क्षमा नम्रता सरलता और संतोष सर्वत्र जोड़ने का कार्य करते है
आख सही रहेगी तो सही दिखेगा। दृष्टी को सम्यक बनाए। स्थितप्रज्ञ अवस्था में आओ तो ही अनुभव होगा जोड़ने वाला धर्म है तोड़ने वाला अधर्म है।

जीवन जीने की कला

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